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Monday, January 06, 2025

Suno Draupadi!

सुनो द्राैपदी ! शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आएंगे... 

   - पुष्यमित्र उपाध्याय

 

सुनो द्राैपदी ! शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आएंगे...
छोड़ो मेहंदी खड्ग संभालो
खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाए बैठे शकुनि,
...मस्तक सब बिक जाएंगे
सुनो द्राैपदी ! शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आएंगे...

कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए अखबारों से
कैसी रक्षा मांग रही हो दुःशासन दरबारों से
स्वयं जो लज्जाहीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचाएंगे
सुनो द्राैपदी ! शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आएंगे... 

कल तक केवल अंधा राजा, अब गूंगा-बहरा भी है
होंठ सिल दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है
तुम ही कहो ये अंश्रु तुम्हारे,
किसको क्या समझाएंगे?
सुनो द्राैपदी ! शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आएंगे...

Thursday, January 02, 2025

Kya Bhooloo.n, Kya Yaad Rakhoo.n - 2

 In the third week of December, my engineering batch had its Silver Jubilee reunion at our alma mater. The weeks preceding the event were spent in an ever-increasing sense of euphoria, culminating in an awesome 2 days at the college, and it continues to be followed by ripples of bonhomie and irreverent banter.

Anyhow, during the build-up for the event, I shared a poem I had written long time ago, a prominent thought behind which was the cheer I found in those four years, and the loss I felt at leaving behind that carefree life and dear friends. The original poem is here:

Kya Bhooloo.n, Kya Yaad Rakhoo.n

I just wrote a post-reunion version of the poem, owing to the bittersweet feelings experienced at the reunion. (And taqdeer vs tadbeer was a thread of discussion going on the reunion group recently).

आज मिले हैं हम तक़दीर से, या मिले तदबीर से
मुद्दतों बाद हुई मुलाक़ातें, क्या भूलूँ क्या याद रखूँ

हसरतें लिए बस मिले अभी, अलविदा कह मुड़ चले अभी
रह गयीं कितनी अनकही बातें, क्या भूलूँ क्या याद रखूँ

बिछड़ने का हाँ ग़म है, साथ गुज़ारे लम्हों का मरहम है
उमड़ते जज़्बों की बरसातें, क्या भूलूँ क्या याद रखूँ

दरों में फासले सही मगर दिलों में फासले नहीं
मिली निस्बतों की सौगातें, ना भूलूँ, मैं याद रखूँ

Tuesday, October 29, 2024

Jyotipath

 ज्योतिपथ 

      - Divya 

दीप है वनवास में औ'
बाती बिरहन सी खड़ी
अँधियारे के द्वार पर
रोशनी रेहन पड़ी

दीप आए जब तलक
न यामिनी को मैं छलूँगा
मोल हो निज प्राण चाहे
दीप बन कर मैं जलूँगा

मैं जला तो संग मेरे
सूर्य को जलना पड़ेगा
मेरे पीछे ज्योतिपथ पर
विश्व को चलना पड़ेगा

व्यर्थ है दीपावली जो
एक लौ भी डगमगाए
व्यर्थ झिलमिल दीप की
गर हर नयन न जगमगाए

डबडबाते हर नयन
उल्लास बन कर मैं चलूँगा
दीपावली की रात का
आभास बन कर मैं चलूँगा

मैं चला तो संग मेरे
ज्योति को चलना पड़ेगा
मेरे पीछे ज्योतिपथ पर
विश्व को चलना पड़ेगा

Sunday, February 04, 2018

Phool ko khaar banaane pe tuli hai duniya

फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया,
  - कुँअर बेचैन

फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया,
सबको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।

मैं महकती हुई मिटटी हूँ किसी आँगन की,
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया ।

हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले,
उनको हथियार बनाने पे तुली है दुनिया ।

जिन पे लफ़्ज़ों की नुमाइश के सिवा कुछ भी नहीं,
उनको फ़नकार बनाने पे तुली है दुनिया ।

क्या मुझे ज़ख़्म नए दे के अभी जी न भरा,
क्यों मुझे यार बनाने पे तुली है दुनिया ।

मैं किसी फूल की पंखुरी पे पड़ी शबनम हूँ,
मुझको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया ।

नन्हे बच्चों से 'कुँअर ' छीन के भोला बचपन,
उनको हुशियार बनाने पे तुली है दुनिया ।

Main usko dhoondh raha hoon

मैं उस को ढूँढ रहा हूँ
  - अजमल सुल्तानपुरी

मुसलमाँ और हिन्दू की जान
कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

मेरे बचपन का हिन्दुस्तान
न बंगलादेश न पाकिस्तान
मेरी आशा मेरा अरमान
वो पूरा पूरा हिन्दुस्तान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ 


वो मेरा बचपन वो स्कूल
वो कच्ची सड़कें उड़ती धूल
लहकते बाग़ महकते फूल
वो मेरे खेत मेरा खलियान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

वो उर्दू ग़ज़लें, हिन्दी गीत
कहीं वो प्यार कहीं वो प्रीत
पहाड़ी झरनों के संगीत
देहाती लहरा पुरबी तान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

जहाँ के कृष्ण जहाँ के राम
जहाँ की शाम सलोनी शाम
जहाँ की सुबह बनारस धाम
जहाँ भगवान करें स्नान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

जहाँ थे तुलसी और कबीर
जायसी जैसे पीर फ़क़ीर
जहाँ थे मोमिन ग़ालिब मीर
जहाँ थे रहमन और रसखा़न
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

वो मेरे पुरखों की जागीर
कराची लाहौर औ कश्मीर
वो बिल्कुल शेर की सी तस्वीर
वो पूरा-पूरा हिन्दुस्तान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

जहाँ की पाक पवित्र ज़मीन
जहाँ की मिट्टी ख़ुल्द-नशीन
जहाँ महराज मोईनुद्दीन
ग़रीब-नवाज़ हिन्द सुल्तान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

मुझे है वो लीडर तस्लीम
जो दे यक-जेहती की तालीम
मिटा कर कुम्बों की तक़्सीम
जो कर दे हर क़ालिब एक जान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

ये भूखा शायर प्यासा कवि
सिसकता चाँद सुलगता रवि
हो जिस मुद्रा में ऐसी छवि
करा दे अजमल को जलपान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ

मुसलमाँ और हिन्दू की जान
कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान
मैं उस को ढूँढ रहा हूँ।

Ashaar mere yun to zamane ke liye hain

अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
  - जाँ निसार अख़्तर

अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शे’र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

आँखों में जो भर लोगे, तो काँटे-से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मन्दिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहजीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं

ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं।

Tuesday, March 24, 2015

Varsha Sameer (Barsaat ki aati hava)


वर्षा समीर
- हरिवंश राय बच्चन (सतरंगिनी से)

बरसात की आती हवा।

वर्षा-धुले आकाश से,
या चन्द्रमा के पास से,
या बादलों की साँस से;
        मधु-सिक्त, मदमाती हवा,
        बरसात की आती हवा।

यह खेलती है ढाल से,
ऊँचे शिखर के भाल से,
आकाश से, पाताल से,
        झकझोर-लहराती हवा;
        बरसात की आती हवा।

यह खेलती है सर-वारि से,
नद-निर्झरों की धार से,
इस पार से, उस पार से,
        झुक-झूम बल खाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

यह खेलती तरुमाल से,
यह खेलती हर डाल से,
लोनी लता के जाल से,
        अठखेल-इठलाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

इसकी सहेली है पिकी,
इसकी सहेली चातकी,
संगिन शिखिन, संगी शिखी,
        यह नाचती-गाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

रँगती  कभी यह इन्द्रधनु,
रँगती  कभी यह चन्द्रधनु,
अब पीत घन, अब रक्त घन,
        रँगरेल-रँगराती हवा;
        बरसात की आती हवा।

यह गुदगुदाती देह को,
शीतल बनती गेह को,
फिर से जगाती नेह को;
        उल्लास बरसाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

यह शून्य से होकर प्रकट,
नव हर्ष से आगे झपट;
हर अंग से जाती लिपट,
        आनंद सरसाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

जब ग्रीष्म में ये जल चुकी,
जब खा अंगार-अनल चुकी,
जब आग में यह पल चुकी,
        वरदान यह पाती हवा;
        बरसात की आती हवा।


तू भी विरह में दह चुका ,
तू भी दुखों को सह चुका,
दुःख की कहानी कह चुका,
        मुझसे बता जाती हवा;
        बरसात की आती हवा।

I had read this poem long time back in school, but it used to be titled 'Barsaat ki aati hawa' (or at least that is what I remember). I had been searching for this poem far and wide, for years and years. After several years, I came to know that this is from the collection 'Satrangini'.  But still could not find it in the online poetry sites, though they had some other poems from this collection. At last, I managed to locate a copy in the library, though in another branch; and after waiting in anticipation for several days, I was finally able to savor this lovely poem again :).

Thursday, July 24, 2014

Jane Kaun Nagar Thaharenge

जाने कौन नगर ठहरेंगे
  - कुमार विश्वास
 
कुछ छोटे सपनों की ख़ातिर
बड़ी नींद का सौदा करने
निकल पड़े हैं पाँव अभागे
जाने कौन नगर ठहरेंगे

वही प्यास के अनगढ़ मोती
वही धूप की सुर्ख़ कहानी
वही ऑंख में घुट कर मरती
ऑंसू की ख़ुद्दार जवानी
हर मोहरे की मूक विवशता
चौसर के खाने क्या जानें
हार-जीत ये तय करती है
आज कौन-से घर ठहरेंगे

कुछ पलकों में बंद चांदनी
कुछ होठों में क़ैद तराने
मंज़िल के गुमनाम भरोसे
सपनों के लाचार बहाने
जिनकी ज़िद के आगे सूरज
मोरपंख से छाया मांगे
उनके ही दुर्गम्य इरादे
वीणा के स्वर पर ठहरेंगे


http://kavitakosh.org/kk/जाने_कौन_नगर_ठहरेंगे_/_कुमार_विश्वास#.U37SGdKSx5Y

Chunavi Ashwasan - Mujhko Sarkaar Banaane Do!

Had come across this one, quite appropriately, at the height of election season, but missed posting it despite my intention to do so.

मुझको सरकार बनाने दो
  - अल्हड़ बीकानेरी
 
जो बुढ्ढे खूसट नेता हैं, उनको खड्डे में जाने दो।
बस एक बार, बस एक बार मुझको सरकार बनाने दो।

मेरे भाषण के डंडे से
भागेगा भूत गरीबी का।
मेरे वक्तव्य सुनें तो झगडा
मिटे मियां और बीवी का।

मेरे आश्वासन के टानिक का
एक डोज़ मिल जाए अगर,
चंदगी राम को करे चित्त
पेशेंट पुरानी टी बी का।

मरियल सी जनता को मीठे, वादों का जूस पिलाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

जो कत्ल किसी का कर देगा
मैं उसको बरी करा दूँगा,
हर घिसी पिटी हीरोइन कि
प्लास्टिक सर्जरी करा दूँगा;

लडके लडकी और लैक्चरार
सब फिल्मी गाने गाएंगे,
हर कालेज में सब्जैक्ट फिल्म
का कंपल्सरी करा दूँगा।

हिस्ट्री और बीज गणित जैसे विषयों पर बैन लगाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

जो बिल्कुल फक्कड हैं, उनको
राशन उधार तुलवा दूँगा,
जो लोग पियक्कड हैं, उनके
घर में ठेके खुलवा दूँगा;

सरकारी अस्पताल में जिस
रोगी को मिल न सका बिस्तर,
घर उसकी नब्ज़ छूटते ही
मैं एंबुलैंस भिजवा दूँगा।

मैं जन-सेवक हूँ, मुझको भी, थोडा सा पुण्य कमाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

श्रोता आपस में मरें कटें
कवियों में फूट नहीं होगी,
कवि सम्मेलन में कभी, किसी
की कविता हूट नहीं होगी;

कवि के प्रत्येक शब्द पर जो
तालियाँ न खुलकर बजा सकें,
ऐसे मनहूसों को, कविता
सुनने की छूट नहीं होगी।

कवि की हूटिंग करने वालों पर, हूटिंग टैक्स लगाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।

ठग और मुनाफाखोरों की
घेराबंदी करवा दूँगा,
सोना तुरंत गिर जाएगा
चाँदी मंदी करवा दूँगा;

मैं पल भर में सुलझा दूँगा
परिवार नियोजन का पचडा,
शादी से पहले हर दूल्हे
की नसबंदी करवा दूँगा।

होकर बेधडक मनाएंगे फिर हनीमून दीवाने दो,
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।
बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो।


http://kavitakosh.org/kk/मुझको_सरकार_बनाने_दो_/_अल्हड़_बीकानेरी#.UykczaiSx5Y

Friday, April 25, 2014

Chal Uth Neta, Tu Chhed Taan

Another gem courtesy KavitaKosh - very contemporary, very true, very sarcastic!
चल उठ नेता
     --रचनाकार: अशोक अंजुम

चल उठ नेता तू छेड़ तान!
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

तू नए-नए हथकंडे ला!
वश में अपने कुछ गुंडे ला!
फ़िर ऊँचे-ऊँचे झंडे ला
हर एक हाथ में डंडे ला
फ़िर ले जनता की ओर तान
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

इस शहर में खिलते चेहरे क्यों?
आपस में रिश्ते गहरे क्यों?
घर-घर खुशहाली चेहरे क्यों?
झूठों पर सच के पहरे क्यों?
आपस में लड़वा, तभी जान!
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

तू अन्य दलों को गाली दे!
गंदी से गंदी वाली दे!
हरपल कोई घात निराली दे!
फ़िर दाँत दिखाकर ताली दे!
फ़िर गा मेरा "मेरा भारत महान"
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?

प्रतिपक्ष पे अनगिन खोट लगा!
ना सम्भल सके यूं चोट लगा!
कुछ भी कर काले नोट लगा!
हर तरफ़ वोट की गोट लगा!
कुर्सी ही अपना लक्ष्य मान!
क्या राष्ट्रधर्म?
क्या संविधान?
 

http://kavitakosh.org/kk/चल_उठ_नेता_/_अशोक_अंजुम#.U0Tn-aiSx5Y

Friday, March 14, 2014

Mat Jiyo Sirf Apni Khushi Ke Liye

I have been following KavitaKosh on FB, and occasionally it comes up with some real gems. One of these that I first read a few days back ...
 
मत जियो सिर्फ़ अपनी खुशी के लिए
  -- उदयभानु ‘हंस’

मत जियो सिर्फ़ अपनी खुशी के लिए
कोई सपना बुनो ज़िंदगी के लिए।

पोंछ लो दीन दुखियों के आँसू अगर,
कुछ नहीं चाहिए बंदगी के लिए।

सोने चाँदी की थाली ज़रूरी नहीं,
दिल का दीपक बहुत आरती के लिए।

जिसके दिल में घृणा का है ज्वालामुखी
वह ज़हर क्यों पिये खुदकुशी के लिए।

उब जाएँ ज़ियादा खुशी से न हम
ग़म ज़रूरी है कुछ ज़िंदगी के लिए।

सारी दुनिया को जब हमने अपना लिया,
कौन बाकी रहा दुश्मनी के लिए।

तुम हवा को पकड़ने की ज़िद छोड़ दो,
वक्त रुकता नहीं है किसी के लिए।

शब्द को आग में ढालना सीखिए,
दर्द काफी नहीं शायरी के लिए।

सब ग़लतफहमियाँ दूर हो जाएँगी,
हँस मिल लो गले दो घड़ी के लिए।

Thursday, September 12, 2013

Tum Kabhi The Surya

Read this wonderful hindi ghazal this morning, thanks to Kavitakosh. Pleasantly surprised to see the poet is Chandrasen Virat, one of whose poems I had read and greatly admired, few years back. While I would love to share the other one some time, I just wanted to share the one I just read right now.
 
तुम कभी थे सूर्य
  -- चंद्रसेन विराट

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गये।
थे कभी मुख्पृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये ॥

यवनिका बदली कि सारा दृष्य बदला मंच का ।
थे कभी दुल्हा स्वयं बारातियों तक आ गये ।।

वक्त का पहिया किसे कुचले कहां कब क्या पता।
थे कभी रथवान अब बैसाखियों तक आ गये ।।

देख ली सत्ता किसी वारांगना से कम नहीं ।
जो कि अध्यादेश थे खुद अर्जियों तक आ गये ।।

देश के संदर्भ मे तुम बोल लेते खूब हो ।
बात ध्वज की थी चलाई कुर्सियों तक आ गये ।।

प्रेम के आख्यान मे तुम आत्मा से थे चले ।
घूम फिर कर देह की गोलाईयों तक आ गये ॥

कुछ बिके आलोचकों की मानकर ही गीत को ।
तुम ॠचाएं मानते थे गालियों तक आ गये ॥

सभ्यता के पंथ पर यह आदमी की यात्रा ।
देवताओं से शुरु की वहशियों तक आ गये ॥

Thursday, March 21, 2013

Prayangeet


Knowing my keen interest in hindi poetry, a friend introduced me to this poem when I was in class 12. Actually he challenged me to decipher the meaning, since this is in a very chaste, sanskrit-ized language. I think I must have scored about 70-75 % :-) But once I knew the meanings of the remaining words, I never forgot the poem - it's beauty had that kind of impact on me :-) 

प्रयाण-गीत 
  -- जयशंकर प्रसाद 

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो।

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी।
सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी।
अराति सैन्य सिंधु में - सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो बढ़े चलो।

Tuesday, March 19, 2013

Mujhko Yaad Kiya Jayega

I love Niraj's lyrical, poem-songs that deeply touch the heart. I am grateful to have read quite a few of them in school, and to find more, thanks to the net. Here is another such poem, I especially love the first and the last stanza of this one.

मुझको याद किया जाएगा 
  -- गोपालदास नीरज 

आँसू जब सम्मानित होंगे मुझको याद किया जाएगा
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।


मान-पत्र मैं नहीं लिख सका
राजभवन के सम्मानों का
मैं तो आशिक रहा जनम से
सुंदरता के दीवानों का
लेकिन था मालूम नहीं ये
केवल इस गलती के कारण
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।


खिलने को तैयार नहीं थीं
तुलसी भी जिनके आँगन में
मैंने भर-भर दिए सितारें
उनके मटमैले दामन में
पीड़ा के संग रास रचाया
आँख भरी तो झूमके गाया
जैसे मैं जी लिया किसी से क्या इस तरह जिया जाएगा


काजल और कटाक्षों पर तो
रीझ रही थी दुनिया सारी
मैंने किंतु बरसने वाली
आँखों की आरती उतारी
रंग उड़ गए सब सतरंगी
तार-तार हर साँस हो गई
फटा हुआ यह कुर्ता अब तो ज्यादा नहीं सिया जाएगा


जब भी कोई सपना टूटा
मेरी आँख वहाँ बरसी है
तड़पा हूँ मैं जब भी कोई
मछली पानी को तरसी है,
गीत दर्द का पहला बेटा
दुख है उसका खेल खिलौना
कविता तब मीरा होगी जब हँसकर जहर पिया जाएगा।

Monday, December 31, 2012

Baki hain

This is the last post for 2012, and another outburst on the recent turn of events. Hope 2013 starts on a better note!

हमारी सब्र के और कितने इम्तिहान बाकी हैं
हश्र से भी आगे कितने तूफ़ान बाकी हैं

हर मोड़ पर खड़े हैं जो सब वहशी हैं या दीवाने
है कौन सी वो जगह जहाँ इंसान बाकी हैं

ज़ख्म दर्द ज़ुल्म तड़प सब दे चुका हम को
ज़माने के और क्या एहसान बाकी हैं

जुबां खामोश है, दिल नाशाद हैं लाचार हैं
हमारी आज़ादी की क्या पहचान बाकी हैं

हमारी हार का जश्न न मनाना मगर अभी
कि दिल में दबे हुए कुछ तूफ़ान बाकी हैं

Thursday, December 27, 2012

Jo Beet Gayi, So Baat Gayi

Bachchan is one of the most prolific poets I have read, and many (or perhaps most!) of his poems have a beautiful, lyrical, almost song-like quality. While poems written in one phase of his life demonstrate a lost hope, another phase echoes finding that hope again. Posting a beautiful song of this hope, that we came across in school many years ago ....
जो बीत गई सो बात गई
  - हरिवंश राय बच्चन 

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गय
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूट
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है

जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है

जो बीत गई सो बात गई

Tuesday, December 18, 2012

Hamare Desh Mein

I read these lines long while ago (if I remember correct, these were a reader's contribution to Khushwant Singh's column 'With Malice Towards One and All'). They had a powerful impact, and its perhaps due to the punch they carried that I still remember them after 20 odd years.

अब झील पर पानी बरसता है हमारे देश में
अब खेत पानी को तरसता है हमारे देश में

अब आदमी का खून सस्ता है हमारे देश में
अब ज़िन्दगी का हाल खस्ता है हमारे देश में

अब लीडरों, अफसरों और पागलों को छोड़ कर
कौन खुल कर हँसता है हमारे देश में

The events of last few weeks have left me outraged, like so many of my compatriots, and this feeling found expression in the following verse (obviously inspired by the one above):

अब ज़हन-ओ-ज़ुबाँ पर पहरे हैं हमारे देश में 
अब ज़मीर हो चुके बहरे हैं हमारे देश में

अब डर के बदल ठहरे हैं हमारे देश में
अब नफरत के कई चेहरे हैं हमारे देश में

धडकनें थमी हुई हैं, दर्द भी खामोश हैं,
अब दिलों पर ज़ख्म गहरे हैं हमारे देश में

***

अब आज़ादी का रंग बिगड़ता है हमारे देश में
अब मासूमों का भाग्य उजड़ता है हमारे देश में

अब सत्य असहाय रो पड़ता है हमारे देश में
अब फरेब का झंडा गड़ता है हमारे देश में

ईमान लुट गए हैं, इन्साफ बिक गए हैं
जुर्मी है अन्याय से जो लड़ता है हमारे देश में

Monday, December 17, 2012

On the sorry state of affairs

I remember reading these lines way back in school (probably in a Hindi guide book), and find them truer than ever ...


When horrendous crimes against women and children are on rise, for a lack of any sort of deterrent, while the powers-to-be are busy with populist and vote-gathering measures (when they are not busy with a multitude of scams to fill up their overflowing lockers .... )

अमनचोर देखो अमन बेचते हैं,
कफ़नचोर देखो कफ़न बेचते हैं,
पहरुआ बनाया था जिनको वतन का,
वो दिल्ली में बैठे वतन बेचते हैं!

फूल बिखरते हैं


हर रोज़ एक नयी चोट लिया करते हैं
बरसों में जाकर कहीं ज़ख्म भरते हैं

ज़माने हो गए उसे भूले हुए फिर भी
उठती है एक टीस जब उस गली से गुज़रते हैं

दुःख के मौसम भी लगते हैं मन की डालों पर
सहमे हुए से खुशियों के फूल बिखरते हैं

धुआँ बन कर उड़ गयीं दिल की हसरतें
जाने कहाँ जाकर ये बादल उतरते हैं

मन की उलझी राहों में से कौन सा उस तक जाता है
किस गाँव में बसते हैं जो ख्वाब सँवरते हैं

कोई याद यूँ ही कभी छेड़ती है दिल का साज
गीत बनकर फिर वही दर्द उभरते हैं  

Wednesday, October 17, 2012

Ma kah ek kahaani

Another beautiful poem we came across in school. A conversation (imagined by the poet, I presume), between Rahul, the son of Gautam Buddha, and his mother.

I find it sweet and poignant - for the innocent insistence of the child who loves to hear stories about the father he has never seen.
माँ कह एक कहानी 
  - मैथिलीशरण गुप्त  

"माँ कह एक कहानी।"
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।"


"तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।"
"जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।"

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।"
"लहराता था पानी, हाँ हाँ यही कहानी।"

"गाते थे खग कल कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्षी की हानी।"
"हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!"

चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।"
"लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।"

"माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।"
"हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।"

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सब ने जानी।"
"सुनी सब ने जानी! व्यापक हुई कहानी।"

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?"
"माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों न उसे उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।"

"न्याय दया का दानी! तूने गुणी कहानी।"